A true inspirational story of Ramesh Chandra Sharma: Book Review

Hello guys, I'm Ashwini Upadhyay in this article I want to discuss the" A true inspirational story of Ramesh chandra Sharma: Book Review "so please read the end of the post so that You can know about This book

A true insipirational stroy of Ramesh chandra shrama: book reveiw एक real stroy है इस story में मुख्य भूमिका Ramesh Chandra Sharma की है

 

Let's talk about the storyline 

ये story ramesh chadra sharma के जीवन मे घटित real story है उन्होंने अपने जीवन के कुछ पाठ खोल कर अपने पाठकों को बताया जिससे कि वे उनकी आंखें खोल सके और शायद उस पाप से , जिस में वो भागीदारी रहे दुसरो को बचा सके


About story

रमेश चंद्र शर्मा, जो पंजाब के 'खन्ना' नामक शहर में एक मेडिकल स्टोर चलाते थे, रमेश चंद्र शर्मा का मेडिकल स्टोर  काफी पुराना और अच्छी स्थिति में  चल रहा था लेकिन जैसे कि कहा जाता है कि धन एक व्यक्ति के दिमाग को भ्रष्ट कर देता है और यही बात रमेश चंद्र जी के साथ भी घटित हुई।

A true insipirational stroy of Ramesh chandra shrama: book reveiw में रमेश जी बताया हैं कि उनकी मेडिकल स्टोर बहुत अच्छी तरह से चल रही थी और वो आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छे थे। अपनी कमाई से उन्होंने जल्द ही जमीन और कुछ प्लॉट भी खरीद लिए और धीरे धीरे अपने मेडिकल  स्टोर के साथ एक लेबोरेटरी भी खोल दिया उन्होंने खुद ही बोला उस समय मैं बहुत ही लालची किस्म का इंसान था वो ये बात जानते थे कि मेडिकल फील्ड में दुगुनी नही बल्कि कई गुना कमाई होता है

शायद ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते होंगे कि मेडिकल प्रोफेशन में 10 रुपये में आने वाली दवा आराम से 70-80 रुपये में बिक जाती है। 

 

वर्ष 2008 में, गर्मी के दिनों में एक बूढ़ा व्यक्ति  जब रमेश चंद्र  शर्मा के स्टोर मेपर आया। उसने बूढ़े आदमी में उन्हें डॉक्टर की पर्ची दी। उन्होंने दवा पढ़ी और उसे निकाल लिया। उस दवा का बिल 560 रुपये बन गया था । लेकिन बूढ़े आदमी में पास मात्र 180 रुपये ही थे । उसने अपनी सारी जेब खाली कर दी लेकिन उस बूढ़े आदमी के पास एक फूटी कौड़ी नही मिली लेखक कहते है मैं उस समय बहुत गुस्से में था क्योंकि मुझे काफी समय लगा  था दवा ढूंढने में और ऊपर से उसके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं थे।

बूढ़ा दवा लेने से मना भी नहीं कर पा रहा था। शायद उसे दवा की ज्यादा जरूरत थी। फिर उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा, "मेरी मदद करो। मेरे पास पर्याप्त  पैसे नही हैं  लेकिन मुझे इसकी बहुत जरूरत है और मेरी पत्नी बीमार है। मैं अपनी पत्नी को इस तरह वृद्धावस्था में मरते हुए नहीं देख सकता।"

लेकिन इतनी बात सुन कर भी लेखक को  उस बूढ़े व्यक्ति पर थोड़ी भी दया नही आई और उन्होंने उसकी एक बात नहीं सुनी और उस बूढ़े इंसान को दवा वापस छोड़ने के लिए कहा।

पर क्या आपको पता है वास्तव में उस बूढ़े आदमी की दवा की कुल राशि 120 रुपये ही बनते थे लेखक कहते है यदि मैंने उस बूढ़े व्यक्ति को 150 रुपये में भी दवा दे दिया होता तो मुझे 30 रुपये का मुनाफा ही होता लेकिन मेरी लालच ने मुझे इतना अंधा बना दिया कि मैंने उस लाचार बूढ़े व्यक्ति को भी नही छोड़ा

फिर मेरी दुकान पर खड़े एक दूसरे ग्राहक ने अपनी जेब से पैसे निकाले और उस बूढ़े आदमी के लिए दवा खरीदी। लेकिन इसका भी मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। मैंने पैसे लिए और बूढ़े को दवाई दे दी 

धीरे धीरे समय बीतता गया और वर्ष 2009 आ गया। मेरे इकलौते बेटे को ब्रेन ट्यूमर हो गया। पहले तो हमें पता ही नहीं चला। लेकिन जब पता चला तो बेटा मृत्यु के कगार पर था। पैसा बहता रहा और लड़के की बीमारी खराब होती गई। प्लॉट बिक गए, जमीन बिक गई और आखिरकार मेडिकल स्टोर भी बिक गया लेकिन मेरे बेटे की तबीयत बिल्कुल नहीं सुधरी। उसका ऑपरेशन भी हुआ और जब सब पैसा खत्म हो गया तो आखिरकार डॉक्टरों ने मुझे अपने बेटे को घर ले जाने और उसकी सेवा करने के लिए कहा। उसके पश्चात 2012 में मेरे बेटे का निधन हो गया। मैं जीवन भर कमाने के बाद भी उसे बचा नहीं सका।

2015 में मुझे भी लकवा मार गया और मुझे चोट भी लग गई। आज जब मेरी दवा आती है तो उन दवाओं पर खर्च किया गया पैसा मुझे काटता है क्योंकि मैं उन दवाओं की वास्तविक कीमतों को जानता हूं।

एक दिन मैं कुछ दवाई लेने के लिए मेडिकल स्टोर पर गया और 100 रु का इंजेक्शन मुझे 700 रु में दिया गया। लेकिन उस समय मेरी जेब में 500 रुपये ही थे और इंजेक्शन के बिना ही मुझे मेडिकल स्टोर से वापस आना पड़ा। उस समय मुझे उस बूढ़े व्यक्ति की बहुत याद आई और मैं घर चला गया।

मैं लोगों से कहना चाहता हूं कि ठीक है कि हम सभी कमाने के लिए बैठे हैं क्योंकि हर किसी के पास एक पेट है। लेकिन वैध तरीके से कमाएं। गरीब लाचारों को लूट कर कमाई करना अच्छी बात नहीं क्योंकि नरक और स्वर्ग केवल इस धरती पर ही हैं, कहीं और नहीं। और आज मैं नरक भुगत रहा हूं।

पैसा हमेशा मदद नहीं करता। हमेशा ईश्वर के भय से चलो। उसका नियम अटल है क्योंकि कई बार एक छोटा सा लालच भी हमें बहुत बड़े दुख में धकेल सकता है।

In the end

तो हमे इस A true insipirational stroy of Ramesh chandra shrama: book reveiw से ये बात सीखने को मिली कि हम जैसे करेंगे हमारे साथ वैसा ही होगा  business करना बुरी बात नही लेकिन अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की आवश्यकताओं को ध्यान न देकर उनका हेल्प नही करना कोई अच्छी बात नही है

अंत मे लेख़क राम चन्द्र शर्मा जी ने अपनी इस भूल से लोगो को ये सिख दी कि आप जिसके साथ जैसा करेंगे आपके साथ वैसा ही होगा तो आप भी दूसरों की हेल्प करे

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