Manas me Sewak Bhaw | In Hindi

Hello Friends, I'm Anshu Singh In this article I want to discuss the Manas me Sewak Bhaw | In Hindi  So please read at the end of the post then you can know more about it. 

 भक्त शिरोमणि कालजयी कवि गोस्वामी तुलसीदास की अमर की कृति रामचरित मानस 'नानापुराण -निगमागम -सम्मत' एवं 'छेड़ो शास्त्र सब ग्रंथन को रस' होकर मौलिकता में सभी काव्यों की अपेक्षा श्रेष्ठ है | यह कृति भक्ति , शील एवं सौंदर्य की प्रतिष्ठा की द्रिष्टी से, उच्च कोटि की शिष्टता एवं साधुता की स्थापना की द्रिष्टी से तथा उत्कृट शील -निरूपण एवं काव्य सौष्ठव की द्रिष्टी से सर्वोपरि है |

ईश्वर क साथ रागात्मक संबंधो का बोध कराति भक्ति के चार स्वरूप है - दास्य , साख्य , वात्सल्य एवं माधुर्य भक्ति | तुलसीदास ने स्वयं को दास्य भक्ति के हीअनुकूल माना हैं

अति अनन्य जो हरि के दासा |
रटै नाम निसि दिन विस्वासा | |
तुलसी तेहि समान नहिं कोई |
हम नीके देखा सब कोई |

यहॉँ इस भक्ति में ब्रह्म ही क्षीरसागर है , ज्ञान मदरांचल पर्वत है और संत देवता है जो उस सागर का मंथन करके कथा रूपी अमृत निकाल लेते हैं , जिसमें भक्ति की मिठास भरी होती हैं |  गोस्वामी जी ने इसी दास्य भाव का आश्रय लिया है जिसके सबल आधार श्री राम हैं | वे ये स्वीकार करते हैं कि श्री राम ने दास भक्तों के लिए ही मानव रूप में अवतार लिया है |

सब क प्रिय सेवक यह निति |
मोरे अधिक दास पर प्रीति | |

वास्तव में दास्य भाव की भक्ति में भक्त या सेवक-सेव्य के स्वरूप में स्वयं को आत्मसात कर लेता है | दास्य भाव से प्रेरित सेवक ईश्वर के समक्ष स्वयं को तुच्छ मानकर उनके वैभवपूर्ण स्वरूप का याचक बन जाता है , किंतु इस भाव में ईश्वर की महानता एवं स्वयं की तुच्छता से दुरी बनी रहती है |

मैं सेवक रघुपति पति मोरे...

इस भक्ति की पराकाष्ठा में सेवक सेव्य में कोई दैत नहीं रहता वे अभिन्न हो जाते हैं | भगवान श्रीराम ने स्वयं स्वीकार किया हैं -

समदरसी मोहि कह सब कोऊ ,
सबके प्रिय अनन्यगति सोऊ | |

प्रभु श्रीराम स्वयं अपने भक्तों के ऋणी है और सेवक जानते है कि प्रभु ही सर्वदा उनके हितकार्य हेतु तत्पर एवं सर्वसमर्थ हैं | स्वयं नारद मुनि ने प्रभु से याचना की थी -

जेहि विधि नाथ होई हित मोरा,
करहु सो बेनि दास मैं तोरा | |

इसलिए तुलसीदास सेवाभाव में आस्था रखते हुए पूर्ण विश्वास के साथ कहते हैं -

मोरे मन प्रभु अस विष्वासा |
राम ते अधिक राम कर दासा | |

भक्त का भी क्या कहना , वह बाध्य नहीं है , वह तो परम सुखी है | यह भक्ति और सेवा वह बाध्य होकर नहीं करता बल्कि वह स्वयं में प्रभु के रूप को आत्मसात कर उसका दास होना सहर्ष स्वीकार कर लेता है | "हम चाकर रघुबीर के...... " कहकर इस महाकवि ने दास्य भक्ति के स्वरूप का निष्पादन किया है | वे तो यहाँ तक कहते हैं कि सेवक-सेव्य भाव क बिना संसार  रूपी सागर से पार पाना सम्भव ही नहीं हैं | -

सेवक सेव्य भाव बिनु
भव न तरिअ उरगारि
भजहु राम पद पंकज
अस सिद्धांत बिचारि |


जैसे भोजन भुख मिटाने के लिए किया जाता है और उस भोजन को जठराग्नि पचा देती है, वैसे ही हरिभक्त सुगम एवमं सुखदाई है, फिर भला ऐसा कौन मूढ़ होगा जिसे यह सेवकाई अच्छी न लगे | इसी के लिए तुलसीदास ने सेवक-सेव्य भक्ति को सर्वोपरि मन है | तुलसी की दृस्टि में यह भक्ति चिंतामणि के समान है क्योकि राम-नाम रूपी चिंतामणि किसके हृदय में निवास करती है , उसके हृदय में दिन-रात ऐसा प्रकाश रहता है कि फिर उसे दीपक, घी, बत्ती आदि की आवश्यकता नहीं रहती |

मोह रूपी दरिद्रता उसके पास नहीं आती और लोभ रूपी पवन भी उसे  कभी बुझा नहीं पता | उससे प्रबल अविघा का अंधकार मिट जाता है, समस्त मदादि पतंग समुदाय हर जाते है और कामादि दुष्ट उसके पास नहीं भटकते | उसके लिए विष अमृत तुल्य हो जाता  है और शत्रु मित्र हो जाते है | इस भक्ति रूपी चिंतामणि के बिना संसार में कोई सुख नहीं पाता समस्त मानस रोग इसी से नष्ट हो जाते हैं | जिसके हृदय में यह भक्ति रूपी चिंतामणि रहती हैं उसे स्वप्न में भी लेशमात्र दुःख नहीं भोगना पड़ता | इसलिए मानव में जो चतुराई में श्रेष्ठ हैं वे इस भक्ति रूप चिंतामणि अर्थात इस सेविकाई के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं परन्तु बिना रामकृपा के इसे कोई प्राप्त नहीं कर सकता |

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ब्रह्म पयोनिधि मंदर , ज्ञान संत सुर आहि |

जो प्राणी भाव सहित ईश्वर को खोजता है, वह निश्चित रूप से सुखों की खान इस भक्ति रूपी चिंतामणि को प्राप्त कर लेता है |

महाकवि ने सेवक के बारे में कहा है की सेवक सर्वदा सेव्य को भी अपने आचरण से वश में रखने की क्षमता रखता है | सेवक को भी अनारम्भ अर्थात सभी प्रकार के उघोगो का परित्याग करने वाला होना चाहिए, अनिकेत अर्थात घर-घर में होना चाहिए , अमानी अर्थात क्रोधहीन होना चाहिए, उसका प्रेम सदैव सज्जनो के सतसंग में होना चाहिए, उसे न कभी शठता | इस प्रकार के समस्त गुणों से युक्त सेवक ही सेव्य को प्राप्त करता है अर्थात उस परमानंद राशि को प्राप्त करता है, जो अनमोल है |

श्री राम के दास्य प्रेम की चर्चा में सर्वोपरि है उनके परमप्रिय हनुमान | श्रीराम हनुमान जी की सेवा तथा प्रेम का मान बारम्बार करते हैं-

हनुमान सय नहिं बड़भागी |
नहिं कोउ राम चरण अनुरागि |

हनुमान को अपने हृदय से लगाकर भगवान ने मानो अपने सिद्धांत को सफल कर दिया-

समदरसी इच्छा कहु नहिं |
हरष सोक भह नहिं मन माहिं | |
अस सज्जन उस बस कैसे |
लोभी हृदय बहस धनु जैसे | |

हनुमान के लिए श्रीराम ही माता-पिता, स्वामी तथा सखा हैं | वे परमदयालु सर्वस्व पालनहार हैं | श्रीराम के अतिरिक्त वे किसी और को जानते ही नहीं है | हनुमान जी के रोम-रोम में श्रीराम रमण करते हैं | उनकी विमलवाणी राम-राम के आह्वान से अविराम गूंजती है- "राम काजु किन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम " ही उनके जीवन का मूल मंत्र है |


इसी भगवत प्रेम के स्वरूप निषादराज को भी प्रभु का प्रसाद मिला | वे पवन पावन समझे जाने लगे-

लोक वेद सब भाँतिहि नीचे |
जासु छाहँ लेइअ सींचा | |
तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता |
मिलत पुलक परिपूरित गाता | |

केवट का भगवतप्रेम भी विचारणीय है | विचित्र है यह यह सेवकाई जिसमें मज़दूर को मजदूरी नहीं, सेवक को सेवकाई नहीं चाहिए | वह वह मात्र नव की रक्षा के लिए चरण धोना चाहता है और धोकर रखता है | प्रसाद के रूप में भी कुछ नहीं लेता -

बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब तागि न पार परवारिहौं |
तब लागि न तुलसीदास नाथ कृपालु पार उतारिहौं | |

वह बार-बार यही कहता है की मैं संतुष्ट हूँ | जीवन भर की मजदूरी मुझे आज मिल गई है -

अब कहु नाथ न चाहिअ मोरे
दीनदयाल अनुग्रह तोरे |

भगवान व्यक्ति के हृदय के भाव को देखते हैं उसी पर रीझते हैं | 'रीझत राम जानि जन जी की'- उन्हें बाध्य सुंदरता से क्या लेना | भक्त के हृदय का अलौकिक प्रेम ही उन्हें आहलाद से भर देता है |

मन बहिसे रघुवंसमनि |
प्रीति अलौकिक जानि | |

श्री राम ने शबरी द्वारा जीमने के लिए दिए कंदमूल को खाकर इस सेवक -सेव्य दास्य भक्ति का जो निरूपण किया है वह जगतविदित है -

कंदमूल फल सुरस अति दिए राम कहूँआमि |
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि | |

सेवक सेव्य भक्ति के स्वरूप में श्री भरत जी के हृदय में 'तत्सुखसुखितवं' की भावना बलवती है | ननिहाल से लौटने पर यहाँ का सब समाचार सुनकर उनका हृदय विदीर्ण हो गया | माँ  कौशल्या एवं गुरु वशिष्ठ जी ने अयोध्या की सभा में उन्हें बहुत प्रकार से समझाया , परन्तु उनकी हार्दिक अभिलाषा , सात्विक निर्णय एक ही था -

मोहि लागि भे सिय राम दुखारी |
प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं | |

सच्चे सेवक या साधक को न तो योग की आवश्यकता है न यज्ञ , न तप और न लंघन ही करने पड़ते है | इसके लिए मात्र सरल स्वभाव होना चाहिए , मन में कुटिलता नहीं होनी चाहिए संतुष्ट रहना चाहिए और मात्र अपने सेव्य का सेवक कहलाकर अन्य किसी की आकांक्षा भी नहीं करनी चाहिए | ऐसे सेवक के लिए सभी दिशाएँ आनंदमयी होती हैं |

तत्पश्चात तुलसी ने अपने मानस में सेवक के उन आचरणों का भी उल्लेख किया है जिसके कारण सेव्य भी अपने सेवक के वश में रहते हैं | कुल मिलाकर प्रभु की आराधना में , उनके चरणों में निरंतर प्रेम रहना चाहिए | यही समस्त साधनों का सुंदर फल है | जल को मथने से घी प्राप्त नहीं किया जा सकता | इसी कारण सेवक का अर्पण अपने ईश के प्रति हो वही सर्वज्ञ , तत्वज्ञ , गुणी एवं अखण्ड विज्ञान एवं समस्त शुभ लक्षणों से युक्त हो जाता है -

जोहि जोनि जनमौ कर्मबस |
तहँ राम पद अनुरागहु | |

एक बार गोस्वामी जो को अकबर के दरबार में मनसबदारी का प्रलोभन मिलने पर उन्होंने यह कहकर अस्वीकार कर दिया था कि - हम चाकर रघुबीर के पात्र लिखो दरबार |

तुलसी अब का होहिंगे नर के मनसबदारा | |

निःसन्देह तुलसीदास जी ने अपने सत्साहित्य में दास्य भक्ति का प्रतिपादन किया, वे सर्वदा इसी निवेदन में प्रार्थनारत हैं -

भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारी |

Final Word

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