Science in Srimad Bhagavad Gita | In Hindi

Hello Friends, I'm Anshu Singh In this article I want to discuss  The Science in Srimad Bhagavad Gita | In Hindi. So please read at the end of the post then you can know more about it.

 

गीता के विज्ञान और आधुनिक विज्ञान में साम्यता जितनी गहरी है, अंतर भी उतने ही प्रबल हैं । साम्यता का संदर्भ लें तो दोनों का मूल प्रश्न एक ही हैं -सृष्टि के मूल का प्रश्न | दूसरी साम्यता है-दोनों अनुभववादी यानी "Imperisite" हैं |

दोनों अपनी-अपनी अवधारणाओं के मंथनो से प्राप्त पूर्णतः प्रामाणिक अनुभवजन्य सत्यों के ही सूत्र रचते हैं | किन्तु अंतर प्रबल है उनके पद्धति  शाश्त्र (Methodology)और अनुशंधान के माध्यमों में बुनियादी अंतर है | यही अंतर उनके कार्यक्षेत्र में आधारभूत अंतर ला देता है | आधुनिक विज्ञान विश्लेषणात्मक पद्धति अपनाता है और गीता संश्लेषणात्मक पद्धति अपनाती है | इसलिए विज्ञान सूक्ष्म गॉड पार्टिकल तक पहुँचता है और गीता सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और विराट से भी विराट ब्रह्म तक |

 

अनुसंधान के माध्यम का अंतर तो और भी विपरीत परिणाम ले आने वाला हैं विज्ञान के अनुसंधान का माध्यम यंत्र है | विज्ञान अपने यंत्रों को सूक्ष्मातिसूक्ष्म द्रिस्टि से सम्पन करते हुए अपने प्राप्तव्य की ओर बढ़ता है | मार्ग में प्राप्त होने वाले प्राकृर्तिक नियमों को तकनीकी में ढालकर विश्व(world) के भीतर और समानांतर मनुष्यनिर्मित विश्व का सृजन कर देता है |

Electron को पाकर उसने अंतरिक्ष में एक अलौकिक Electronic विश्व सूरज दिया है , हिग्सबोसोन को तकनीकी में ढ़लकर वह अंतरिक्ष से परे आकाश में भी अपना विश्व रचने में सफल हो जाएगा |  आधुनिक विज्ञान मनुष्य के विष्वामित्र रूप के रूपक हैं |

गीता की प्रयोगात्मक मनुष्य है | व्यष्टि मानव, सामाजिक समष्टि मानव है   | वह मनुष्य की अंतद्रिस्टी को सूक्ष्मातिसूक्ष्म दर्शन में दीक्षित करती हैं उसी अनुपात में उसकी चेतना का  विस्तार करते हुए अंततः मनुष्य को ही संपूर्ण ब्रह्मांड में बदल देती है | गीता का विज्ञान उपनिषदों का ही विज्ञान है | पारंपरिक और आधुनिक भारतविदों ने भी गीता को उपनिषदों का सार सिद्ध किया है | उपनिषद उन छोटी -बड़ी किताबों को नहीं कहते , बल्कि इन सूत्रों को कहते हैं -

अहम् ब्रह्मास्मि, सर्वत्र खल्विदं ब्रह्म,
यत, पिण्डे तत ब्रह्मांडे , अयमात्मा ब्रह्म ,
तत त्वमसि , रसो वै सः , इत्यादि |

गीता इन्हीं ब्रह्मांड -वैज्ञानिक सूत्रों को अपने युग के अनुरूप श्लोकों में ढाल देती है | आधुनिक मनुष्य की तरह ही निराशा और संदेह की पराकाष्ठा पर खड़ा अर्जुन अंत में जब युद्ध सन्नद्ध है , तो वह इन्हीं सूत्रों के समन्वय को सिद्ध क्र चुका होता है -"निमित्तमात्रेण भव सव्यसाची "

उपनिषदों के पूर्वज आरण्यक केवल बाहय प्रकृति का अनुसंधान करके पाँच तत्वों की पहचान कर चुके थे | उपनिषद अंतः और बाहय दोनों प्रकृतियों का अनुसंधान करते हैं | अंतर जगत  में देह, मन , प्राण, चेतना से होते हुए मानव अस्तित्व के मूल तत्व 'आत्मा ' को पाते हैं और आत्मा तथा ब्रह्म दोनों को एक करके 'यत पिण्डे तत ब्रह्मांडे' को सिद्ध करते हैं |

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ब्रह्म क्या है?

'बृहणशील इति ब्रह्मं ' निरंतर विस्तृत होते हुए को ब्रह्म कहते हैं | यही आधुनिक विज्ञान की नवीनतम थेओरि बिग बंग थ्योरी है | मूल तत्व के विस्फोट से सृष्टि का सृजन होता है और फिर सृष्टि
निरंतर अनंत होती चली जाती है | गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं -

"अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोsध्यात्ममुच्यते |
भूत भावोभ्दवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः | | "

उपनिषदों में व्यक्तः -

ब्रह्मपरिणामवादी अर्थात ब्रह्म (चेतना ) और जगत (पदार्थ ) दोनों को सत्य मानने वाले तथा ब्रह्म को सत्य और जगत को माया मानने वाले ब्रह्मविवर्तवादी सभी भारतीय दर्शनों के बीज, गीता के समय तक वृक्ष में बदलकर गीता में अनुस्यूत हैं |

भारतीय दर्शनों में न्याय तर्क शास्त्र है | अणु -परमाणु से लेकर ईशवरतत्व गॉड-पार्टिकल हिग्स -बोसोन तक अनुसंधान करने वाला वैशेषिक शुद्ध भौतिक विज्ञान है | सांख्य भौतिक विज्ञान  और मनोविज्ञान का अदवैत है तथा साइकोसोमेटिक थेरेपीज़ यानि मनोशारीरिक चिकित्सा पद्धतियों से सम्पन योग शुद्ध मनोविज्ञान |

इन्हीं ब्रह्मपरिणामवादी दर्शनों के बल पर गीता विज्ञान की मौलिक समस्या-पदार्थ और चेतना के समस्या के प्रश्न का समाधान प्रस्तुत कर देती है कि पदार्थ और चेतना एक ही अंतर्वस्तु नाम है जिसे भौतिक विज्ञान ने आज हाईजन बर्ग की थ्योरी में पाया है, ठीक इन्हीं शब्दों में भगवान कृष्ण जब कहतें है कि -

"यदा भूतभावमेकस्थमनुपश्यति |
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पघते तदा | | "

तब वे वस्तुतः यही कह रहे हैं |

 

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